मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

कचनार

कचनार छोटे से लेकर मध्यम ऊंचाई वाला वृक्ष है। यह भारत के सभी जंगलों में पाया जाता है। हिमालय के तराई वाले भागों में इसकी संख्या अधिक है। यहाँ 1500 मीटर तक कभी-कभी इससे भी अधिक ऊंचाई वाले भागों में इसके वृक्ष देखने को मिल जाते है। यह दोनों रूपों में पैदा होता है - स्वतः और सप्रयास। कचनार के वृक्ष जंगलो में अनुकूल पर्यावरण मिलने पर स्वतः उत्पन्न हो जाते है। इस प्रकार के वृक्ष हिमालय के तराई वाले भागों में और दक्षिण भारत के जंगलों में ज्यादा है। यह एक सुन्दर और उपयोगी फूलों वाला वृक्ष है।  अतः इसे बाग़-बगीचों, उद्यानों और बड़े-बड़े पार्कों में शोभा बढ़ाने के लिए सप्रयास भी लगाया जाता है।


बैंगनीपन लिए लाल फूलों वाला कचनार

भारत में कचनार की अनेक जातियां पायी जाती है। इन्हे फूलों के रंगों के आधार पर चार भागों में बांटा जा सकता है। इन चारों के वैज्ञानिक नाम भी अलग-अलग है। अनेक रंगों वाला कचनार (बौहिनिया वेरीगेटा), बैंगनीपन लिए लाल फूलों वाला कचनार (बौहिनिया टोमेनटोसा) और सफ़ेद फूलों वाला कचनार (बौहिनिया आकूमिनाटा) । इनमें मिश्रित रंग के फूलों वाला कचनार वास्तविक कचनार है तथा औषधि निर्माण में मुख्य रूप से इसी का उपयोग किया जाता है, किंतु लगभग सामान गुणधर्म के कारण शेष तीनों प्रकार के वृक्षों और उनके फूलों को भी कचनार ही कहा जाता है।

सुंदर फूलों वाले इस वृक्ष का तना छोटा और गांठो वाला होता है। इसकी छाल खुरदरी तथा कुछ अनियमित दानेदार उभारों वाली होती है। कचनार के तने की छाल के बाहरी भाग पर अर्धगोलाकार और लम्बी धारियां दिखाई देती है। इस पर छेद करने अथवा काट कर चीरा लगाने से भूरे रंग का गोंद निकलता है।  कचनार की छाल में टैनिन और शर्करा भी होती है।

यह पतझड़ वाला वृक्ष है। जनवरी से मार्च के मध्य इसके पत्ते गिर जाते है और कुछ समय के लिए यह वृक्ष पर्णहीन हो जाता है। इसके पत्ते 6.5 सेंटीमीटर से लेकर 15 सेंटीमीटर लम्बे एवं 7.5 सेंटीमीटर से लेकर 16.5 सेंटीमीटर तक चौड़े होते है। अर्थात् इसके पत्तो की चौड़ाई लम्बाई के बराबर अथवा इससे कुछ अधिक होती है। ये ह्रदय की आकृति वाले होते है और इनमें नौ से ग्यारह तक शिराएँ होती है। ये मोटे और मजबूत डंठल की सहायता से वृक्ष की डाल से जुड़े रहते है। इसका डंठल लगभग एक सेंटीमीटर लम्बा और महीन-महीन रोयें वाला होता है। कचनार के पत्तों की एक प्रमुख विशेषता यह है कि ये एक चौथाई अथवा एक तिहाई दूरी पर कटे होते है और अगला सिरा गोल एवं दबा हुआ होता है। अतः ऐसा लगता है, मानो दो पत्ते जुड़े हुए थे। इसलिए कचनार वृक्ष को युगपुत्र कहा गया है। साहित्यकारों ने कचनार के पत्तों की तुलना गाय और बकरी के खुरों से की है।


कचनार के हृदयाकार पत्ते

कचनार के वृक्ष पर पतझड़ के बाद फरवरी से अप्रेल के मध्य फूल आते है। इसके फूल गुच्छों में निकलते है। इनमे प्रायः दो-तीन फूल होते है। भीनी-भीनी मधुर सुगंध आती है।  रंग सफ़ेद, गुलाबी और हल्का बैंगनी होता है।  कभी-कभी गहरे रंग के फूल देखने को मिल जाते है।  कचनार के फूल के बीच में तीन से पांच तक पुंकेसर, अर्थात् पुष्प केशर होते है। इनके चारों ओर गोलाई लिए हुए, लम्बी और नुकीले सिरों वाली पंखुड़ियाँ होती है। ये पंखुड़ियाँ आधार पर पतली होती है और इन पर पतली-पतली रेखाएं दिखाई देती है।

अप्रेल-मई में कचनार वृक्ष पर फलियां आती है और पकती है। यह 15 सेंटीमीटर से 30 सेंटीमीटर तक चौड़ी, चपटी, चिकनी और एक ओर थोड़ी सी मुड़ी हुई होती है। इसकी एक फली में 10 से 15 तक बीज होते है। जो बड़े उपयोगी होते है। इनमे 16.5 प्रतिशत पीले रंग का तेल होता है। इसका विभिन्न प्रकार की देशी और आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में उपयोग किया जाता है।

कचनार बौहिनिया वंश का वृक्ष है। इस वंश की दूसरी जाति बौहिनिया परप्यूरिया है, जो बैंगनीपन लिए हुए लाल फूलों वाला कचनार के समान होता है। कहते है कि यह वृक्ष जमीन को फाड़कर बाहर निकलता है इसीलिए इसे कोविदार कहते है।








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