शनिवार, 21 दिसंबर 2013

चंदन

चंदन मुख्य रूप से कर्नाटक और इसके आसपास के क्षेत्रों का वृक्ष है। दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी इसके वृक्ष पाये जाते है। यह मूल रूप से पथरीले और पहाड़ी क्षेत्रों का वृक्ष है। मैसूर, कुर्ग, मालाबार आदि में चंदन के विशाल जंगल है। चंदन के वृक्ष दक्षिण भारत के साथ ही साथ भारत के अन्य भागों में भी पाये जाते है, किन्तु दक्षिण भारत के चन्दन के वृक्षों की लकड़ी अधिक तेल वाली और सुगंधित होती है।

भारत और पूर्वी एशिया के कुछ अन्य देशों के साथ ही चंदन का वृक्ष दक्षिण प्रशांत के कुछ द्वीपों पर भी पाया जाता है। विश्व में सब मिलाकर चंदन की लगभग 10 प्रजातियां पायी जाती है। इनमे सफ़ेद चंदन (सैंटेलम एल्बम) सर्वाधिक उपयोगी माना जाता है। भारत में चार प्रकार के चंदन के वृक्षों की जानकारी है- सफ़ेद चंदन, पीला चंदन, लाल चंदन और कुचंदन। विद्वानों का मत है कि सफ़ेद चंदन और पीला चंदन एक है तथा लाल चन्दन को ही कुचंदन कहा गया है।

चंदन मध्यम आकार का और बहुत धीमी गति से बढ़ने वाला वृक्ष है। यह लगभग 30 वर्षों में पककर तैयार होता है और लगभग 125 वर्षों तक जीवित रहता है। यह अर्ध-परजीवी वृक्ष है। इसकी जड़े अपने आसपास के वृक्षों की जड़ो से लिपट जाती है और उनसे अपना भोजन प्राप्त करती है। अर्ध-परजीवी होने के कारण चंदन का वृक्ष सदाबहार बन गया है। अर्थात् यह पूरे वर्ष हरा-भरा रहता है। किंतु परजीवी होने के कारण इनके आसपास वृक्ष नहीं पनप पाते है। एक प्रमुख विशेषता यह है कि केवल इसकी लकड़ी में ही सुगंध होती है। इसके फल, फूल, बीज आदि पूरी तरह गंधहीन होते है।

छह मीटर से बारह मीटर तक ऊँचे चंदन के वृक्ष की शाखाएं और उपशाखाएं पतली एवं कोमल होती है। तने का बाह्य काष्ठ अर्थात तने के बाहरी भाग की लकड़ी तथा कच्ची लकड़ी सफ़ेद और गंधहीन होती है। अन्तःकाष्ठ अर्थात चन्दन के वृक्ष के तने के भीतरी भाग की लकड़ी, विशेष रूप से पुराने वृक्षों के भीतरी भाग की लकड़ी, पीलापन लिये हुए भूरे रंग की होती है एवं इससे भीनी-भीनी मधुर गंध आती है। तने की छाल का बाहरी भाग कालापन लिये धूसर रंग का होता है और इससे किसी प्रकार की गंध नहीं आती। छाल का भीतर वाला भाग लाली लिये हुए हल्के रंग का होता है। चंदन के वृक्ष की छाल पर लम्बी-लम्बी सीधी खड़ी दरारें होती है जिनका भीतरी भाग सफ़ेद होता है। चंदन की लकड़ी के कटे हुए भाग (अनुप्रस्थ परिच्छेद) को यदि ध्यान से देखा जाये तो इसकी सतह पर पीलापन लिये एवं लाली लिये हुए हल्के रंग के अनेक वृत्त दिखाई देते है। ये वास्तव में वार्षिक छल्ले (एनुअलरिंग्स) होते है। इनकी सहायता से चंदन के वृक्ष की आयु मालूम की जा सकती है। वृक्ष की शाखाओं उपशाखाओं पर डंठल युक्त पत्तियां निकलती है। चंदन की पत्तियां जोड़े में होती है एवं शाखा पर एक ही स्थान से एक दूसरे से विपरीत दिशा में निकलती है, पत्तियां चर्मिल एवं चिकनाईयुक्त होती है। इनका स्वरुप अंडाकार होता है तथा आगे का सिरा नुकीला होता है। यह पत्तियां आधार की ओर अर्थात डंठल की ओर भी कम चौड़ी होती है। बीच वाला भाग सर्वाधिक चौड़ा होता है और धीरे-धीरे इनकी चौड़ाई कम होती जाती है और सिरे के निकट पहुंच कर चौड़ाई सबसे कम हो जाती है तथा सिरा नुकीला हो जाता है।

इसके वृक्ष पर फूलों के बाद फल आते है। फूलों के समान फल भी वर्ष में दो बार आते है। छोटे और गोल फल हल्के रंग के होते है तथा पक जाने पर इनका रंग कालापन लिए बैंगनी हो जाता है। यह फल गुदे वाले होते है एवं इनके भीतर बहुत छोटी गुठली होती है। फल विभिन्न प्रकार के पक्षियों का प्रिय भोजन है। चंदन के फल की गुठलियां अर्थात इसके बीजों में तेल होता है। इनसे 50 प्रतिशत से 55 प्रतिशत तक तेल प्राप्त किया जा सकता है। बीजों का तेल लाल रंग का और बहुत गाढ़ा होता है।

एक उपयोगी वृक्ष है। इसकी लकड़ी और लकड़ी से निकाला हुआ तेल अनेक कार्यों में प्रयुक्त होता है। चंदन के वृक्ष की जड़ो से भी तेल प्राप्त किया जाता है। एक किलोग्राम लकड़ी से लगभग 100 मिलीमीटर तेल निकलता है। इसका तेल गाढ़ा और रंगहीन होता है। कभी-कभी इसमें हल्का पीलापन अवश्य दिखाई देता है। इसका स्वाद तीखा, चरपरा और अरुचिकर होता है एवं इसमें एक विशेष प्रकार की तेज सुगंध आती है। चंदन की लकड़ी के बुरादे और तेल निकली हुई लकड़ी की लुगदी से भी इसी प्रकार की मधुर सुगंध आती है। यहां पर विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि चंदन के वृक्ष के तने के भीतरी भाग की लकड़ी (हार्टवुड) का तेल अधिक अच्छा माना जाता है। इसे बोतलों में भरकर सीलबंद कर के अंधेरे और शुष्क स्थानों पर रखा जाता है। इस प्रकार यह लम्बे समय तक सुरक्षित बना रहता है। चंदन का तेल बड़ा उपयोगी होता है। इसके द्वारा विभिन्न रोगों की आयुर्वेदिक औषधियां तैयार की जाती है। इसके साथ ही इसका उपयोग कीमती इत्र, साबुन,मोमबत्ती, धूपबत्ती, अगरबत्ती, पाउडर तथा विभिन्न प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है।

चंदन मुख्य रूप से औषधीय उपयोग का वृक्ष है। इसकी लकड़ी के बुरादे और तेल से आयुर्वेदिक औषधियों के समान यूनानी दवाएं भी तैयार की जाती है। साथ ही दैनिक जीवन में भी हम चंदन का उपयोग करते है। गर्मियों के मौसम में चंदन के तेल की एक बूंद दूध के साथ सेवन करने से लू का प्रकोप शांत हो जाता है। चंदन का तेल लगाने अथवा चंदन को पानी में घिस कर इसका लेप करने से घमौरियों से राहत मिलती है। सामान्यतया चंदन के द्वारा तैयार की गयी औषधियां दो प्रकार की होती है। पहली वे औषधियां है जिनमे केवल चंदन का उपयोग किया जाता है। इन औषधियों में अन्य जड़ी-बूटियां नहीं मिलायी जाती। दूसरी वे औषधियां है, जिनमे चंदन के साथ ही अन्य जड़ी-बूटियों का भी उपयोग किया जाता है। सेवन कि दृष्टि से भी चंदन से तैयार की गयी औषधियां दो प्रकार की होती है- बाह्य प्रयोग और अंतः प्रयोग, बाह्य प्रयोग की औषधियां खाते अथवा पीते नहीं है, बल्कि इनका उपयोग मलहम, लेप अथवा पाउडर के समान किया जाता है। अंतः प्रयोग की औषधियां शहद, दूध, पानी आदि के साथ गोली, चटनी, शरबत आदि के रूप में सेवन की जाती है।



मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

कचनार

कचनार छोटे से लेकर मध्यम ऊंचाई वाला वृक्ष है। यह भारत के सभी जंगलों में पाया जाता है। हिमालय के तराई वाले भागों में इसकी संख्या अधिक है। यहाँ 1500 मीटर तक कभी-कभी इससे भी अधिक ऊंचाई वाले भागों में इसके वृक्ष देखने को मिल जाते है। यह दोनों रूपों में पैदा होता है - स्वतः और सप्रयास। कचनार के वृक्ष जंगलो में अनुकूल पर्यावरण मिलने पर स्वतः उत्पन्न हो जाते है। इस प्रकार के वृक्ष हिमालय के तराई वाले भागों में और दक्षिण भारत के जंगलों में ज्यादा है। यह एक सुन्दर और उपयोगी फूलों वाला वृक्ष है।  अतः इसे बाग़-बगीचों, उद्यानों और बड़े-बड़े पार्कों में शोभा बढ़ाने के लिए सप्रयास भी लगाया जाता है।


बैंगनीपन लिए लाल फूलों वाला कचनार

भारत में कचनार की अनेक जातियां पायी जाती है। इन्हे फूलों के रंगों के आधार पर चार भागों में बांटा जा सकता है। इन चारों के वैज्ञानिक नाम भी अलग-अलग है। अनेक रंगों वाला कचनार (बौहिनिया वेरीगेटा), बैंगनीपन लिए लाल फूलों वाला कचनार (बौहिनिया टोमेनटोसा) और सफ़ेद फूलों वाला कचनार (बौहिनिया आकूमिनाटा) । इनमें मिश्रित रंग के फूलों वाला कचनार वास्तविक कचनार है तथा औषधि निर्माण में मुख्य रूप से इसी का उपयोग किया जाता है, किंतु लगभग सामान गुणधर्म के कारण शेष तीनों प्रकार के वृक्षों और उनके फूलों को भी कचनार ही कहा जाता है।

सुंदर फूलों वाले इस वृक्ष का तना छोटा और गांठो वाला होता है। इसकी छाल खुरदरी तथा कुछ अनियमित दानेदार उभारों वाली होती है। कचनार के तने की छाल के बाहरी भाग पर अर्धगोलाकार और लम्बी धारियां दिखाई देती है। इस पर छेद करने अथवा काट कर चीरा लगाने से भूरे रंग का गोंद निकलता है।  कचनार की छाल में टैनिन और शर्करा भी होती है।

यह पतझड़ वाला वृक्ष है। जनवरी से मार्च के मध्य इसके पत्ते गिर जाते है और कुछ समय के लिए यह वृक्ष पर्णहीन हो जाता है। इसके पत्ते 6.5 सेंटीमीटर से लेकर 15 सेंटीमीटर लम्बे एवं 7.5 सेंटीमीटर से लेकर 16.5 सेंटीमीटर तक चौड़े होते है। अर्थात् इसके पत्तो की चौड़ाई लम्बाई के बराबर अथवा इससे कुछ अधिक होती है। ये ह्रदय की आकृति वाले होते है और इनमें नौ से ग्यारह तक शिराएँ होती है। ये मोटे और मजबूत डंठल की सहायता से वृक्ष की डाल से जुड़े रहते है। इसका डंठल लगभग एक सेंटीमीटर लम्बा और महीन-महीन रोयें वाला होता है। कचनार के पत्तों की एक प्रमुख विशेषता यह है कि ये एक चौथाई अथवा एक तिहाई दूरी पर कटे होते है और अगला सिरा गोल एवं दबा हुआ होता है। अतः ऐसा लगता है, मानो दो पत्ते जुड़े हुए थे। इसलिए कचनार वृक्ष को युगपुत्र कहा गया है। साहित्यकारों ने कचनार के पत्तों की तुलना गाय और बकरी के खुरों से की है।


कचनार के हृदयाकार पत्ते

कचनार के वृक्ष पर पतझड़ के बाद फरवरी से अप्रेल के मध्य फूल आते है। इसके फूल गुच्छों में निकलते है। इनमे प्रायः दो-तीन फूल होते है। भीनी-भीनी मधुर सुगंध आती है।  रंग सफ़ेद, गुलाबी और हल्का बैंगनी होता है।  कभी-कभी गहरे रंग के फूल देखने को मिल जाते है।  कचनार के फूल के बीच में तीन से पांच तक पुंकेसर, अर्थात् पुष्प केशर होते है। इनके चारों ओर गोलाई लिए हुए, लम्बी और नुकीले सिरों वाली पंखुड़ियाँ होती है। ये पंखुड़ियाँ आधार पर पतली होती है और इन पर पतली-पतली रेखाएं दिखाई देती है।

अप्रेल-मई में कचनार वृक्ष पर फलियां आती है और पकती है। यह 15 सेंटीमीटर से 30 सेंटीमीटर तक चौड़ी, चपटी, चिकनी और एक ओर थोड़ी सी मुड़ी हुई होती है। इसकी एक फली में 10 से 15 तक बीज होते है। जो बड़े उपयोगी होते है। इनमे 16.5 प्रतिशत पीले रंग का तेल होता है। इसका विभिन्न प्रकार की देशी और आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में उपयोग किया जाता है।

कचनार बौहिनिया वंश का वृक्ष है। इस वंश की दूसरी जाति बौहिनिया परप्यूरिया है, जो बैंगनीपन लिए हुए लाल फूलों वाला कचनार के समान होता है। कहते है कि यह वृक्ष जमीन को फाड़कर बाहर निकलता है इसीलिए इसे कोविदार कहते है।